नई दिल्ली। सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty-IWT) को लेकर भारत ने अपना रुख और सख्त कर दिया है। सूत्रों के मुताबिक, भारत अब 1960 की संधि को पुराने स्वरूप में बहाल करने के पक्ष में नहीं है। सरकार का मानना है कि सीमा पार आतंकवाद को लेकर पाकिस्तान के रवैये ने आपसी भरोसे की बुनियाद को कमजोर कर दिया है, ऐसे में पहले जैसी व्यवस्था में लौटना संभव नहीं है।इसी बीच भारत जम्मू-कश्मीर में जलविद्युत उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। आने वाले वर्षों में 5,500 मेगावाट से अधिक क्षमता के नए हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स शुरू करने की योजना है, जिससे देश की ऊर्जा क्षमता मजबूत होगी और सिंधु नदी प्रणाली के तहत उपलब्ध जल संसाधनों का अधिक प्रभावी उपयोग किया जा सकेगा।
2025 के बाद बदला भारत का रुख
पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने 2025 में सिंधु जल संधि को स्थगित (Abeyance) कर दिया था। अब सरकारी सूत्रों का कहना है कि पुराने ढांचे में संधि को फिर से लागू करना व्यावहारिक नहीं है। भविष्य में यदि कोई नई व्यवस्था बनती है, तो उसमें जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों का पिघलना, बदलती जल उपलब्धता, बढ़ती ऊर्जा जरूरतें, नई तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे पहलुओं को शामिल किया जाएगा।
5,500 मेगावाट क्षमता के नए प्रोजेक्ट्स पर तेजी
भारत जम्मू-कश्मीर में कई बड़े जलविद्युत परियोजनाओं पर तेजी से काम कर रहा है। इनमें इस वर्ष 624 मेगावाट क्षमता वाला किरू और 1,000 मेगावाट क्षमता वाला पाकल दुल हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट शुरू होने की उम्मीद है।
इसके अलावा जिन प्रमुख परियोजनाओं पर काम आगे बढ़ाया जा रहा है, उनमें शामिल हैं—
- सवालकोट – 1,856 मेगावाट
- रातले – 850 मेगावाट
- उरी-1 एवं उरी-2 – 240 मेगावाट
- दुल्हस्ती स्टेज-2 – 260 मेगावाट
- क्वार प्रोजेक्ट – 540 मेगावाट
- इनमें से कई परियोजनाओं पर पाकिस्तान पहले भी आपत्ति जताता रहा है।
70 से अधिक परियोजनाओं की जानकारी साझा कर चुका है भारत
रिपोर्ट्स के अनुसार भारत सिंधु नदी प्रणाली से जुड़ी 70 से अधिक परियोजनाओं की जानकारी पाकिस्तान को दे चुका है। हालांकि पाकिस्तान ने बगलिहार, तुलबुल और अन्य कई परियोजनाओं पर लगातार आपत्तियां दर्ज कराई हैं। वर्ष 2023 में भारत ने संधि की समीक्षा को लेकर बातचीत की पहल भी की थी, लेकिन कोई ठोस समाधान नहीं निकल सका।
पाकिस्तान की जल प्रबंधन व्यवस्था पर भी सवाल
विशेषज्ञों का कहना है कि पाकिस्तान अपने उपलब्ध जल संसाधनों का प्रभावी उपयोग नहीं कर पा रहा है। देश में पर्याप्त जल भंडारण (Storage) परियोजनाओं की कमी है और बड़ी मात्रा में पानी बिना उपयोग के बह जाता है। लंबे समय से प्रस्तावित कालाबाग बांध भी प्रांतीय विवादों के कारण अधूरा है, जबकि मंगला बांध की क्षमता गाद जमा होने से पहले ही काफी घट चुकी है।
भारत की प्राथमिकता—सुरक्षा और जल संसाधनों का बेहतर उपयोग
भारत का स्पष्ट संदेश है कि सीमा पार आतंकवाद पर भरोसेमंद और ठोस कार्रवाई के बिना द्विपक्षीय विश्वास बहाल होना मुश्किल है। सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और साथ ही देश के हिस्से के जल संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करने के लिए जलविद्युत परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जाएगा।फिलहाल पाकिस्तान इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया का सहारा ले रहा है, जबकि भारत का कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में संधि स्थगित होने के कारण इस तरह की प्रक्रिया का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।





