बिलासपुर। छत्तीसगढ़ में कर्मचारियों की वरिष्ठता (Seniority) को लेकर हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल प्रशासनिक कारणों से किए गए तबादले के आधार पर किसी कर्मचारी की पहले से अर्जित वरिष्ठता समाप्त नहीं की जा सकती।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने वन विभाग के वर्ष 2014 के उस सर्कुलर की एक शर्त को सीमित दायरे में असंवैधानिक माना है, जिसमें एक वन वृत्त से दूसरे वन वृत्त में स्थानांतरित कर्मचारियों को नई वरिष्ठता सूची में सबसे नीचे रखने का प्रावधान था।
फॉरेस्ट गार्ड्स ने दी थी चुनौती
- यह मामला वर्ष 2013 में प्रत्यक्ष भर्ती से नियुक्त कई फॉरेस्ट गार्ड्स की याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि उनका तबादला केवल प्रशासनिक जरूरतों के कारण किया गया था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें वरिष्ठता सूची में सबसे नीचे कर दिया गया।
- उन्होंने तर्क दिया कि भर्ती प्रक्रिया में मिली मेरिट को केवल एक कार्यपालिक सर्कुलर के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे उनके प्रमोशन और सेवा लाभ प्रभावित हो रहे थे।
सरकार ने रखी अपनी दलील
राज्य शासन की ओर से तर्क दिया गया कि वन विभाग के 31 जुलाई 2014 के सर्कुलर और छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (सेवा की सामान्य शर्तें) नियम, 1961 के अनुसार अंतरवृत्त स्थानांतरण होने पर कर्मचारी की वरिष्ठता नए वृत्त में सबसे नीचे निर्धारित की जाती है। इसी आधार पर कर्मचारियों के अभ्यावेदन खारिज किए गए थे।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
- हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि याचिकाकर्ता तबादले के माध्यम से नियुक्त कर्मचारी नहीं थे, बल्कि वे नियमित भर्ती प्रक्रिया से नियुक्त हुए थे। बाद में उनका स्थानांतरण प्रशासनिक कारणों से किया गया।
- कोर्ट ने टिप्पणी की कि प्रशासनिक तबादला सेवा का सामान्य हिस्सा है और इसके कारण कर्मचारी को प्रतिकूल नागरिक परिणाम नहीं भुगतने चाहिए। किसी कर्मचारी की वरिष्ठता खत्म करने के लिए स्पष्ट वैधानिक प्रावधान होना जरूरी है।
वरिष्ठता दोबारा तय करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने 31 जुलाई 2014 के सर्कुलर की संबंधित शर्त को संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के विपरीत बताते हुए निरस्त कर दिया। साथ ही कर्मचारियों के अभ्यावेदन खारिज करने वाले आदेश को भी रद्द कर दिया।
कोर्ट ने राज्य शासन को निर्देश दिया है कि संबंधित कर्मचारियों की वरिष्ठता भर्ती की मूल मेरिट और लागू नियमों के आधार पर 90 दिनों के भीतर दोबारा निर्धारित की जाए।
हाईकोर्ट के इस फैसले को राज्य के कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे प्रशासनिक तबादलों के कारण वरिष्ठता प्रभावित होने के मामलों में नई दिशा मिलेगी।



