नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि आज की नई पीढ़ी हर बात पर सवाल करती है, इसलिए उन्हें केवल उपदेश देने के बजाय तर्क, संवाद और अपनत्व के साथ समझाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि बच्चों और युवाओं को सबसे अधिक समय, स्नेह और भावनात्मक सहयोग की जरूरत होती है।दिल्ली में विश्वमांगल्य सभा द्वारा आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम ‘युगानुकूल मातृत्व’ के समापन सत्र को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि मातृत्व केवल परिवार तक सीमित भूमिका नहीं है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों, संवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन की आधारशिला है। उनके अनुसार, परिवार और समाज दोनों की मजबूती में मातृत्व की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि प्रकृति ने सभी जीवों को जीवन दिया है, लेकिन मनुष्य को सोचने और विवेक से निर्णय लेने की विशेष क्षमता प्रदान की है। यही क्षमता उसे अन्य प्राणियों से अलग बनाती है और समाज तथा सभ्यता के विकास में अग्रणी भूमिका निभाने योग्य बनाती है।भागवत ने भारतीय संस्कृति और परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में रहने वाले लोगों को बिना विचार किए विदेशी जीवनशैली अपनाने के बजाय भारतीय मूल्यों और संस्कृति के अनुरूप जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इतिहास में विदेशी आक्रमणों और औपनिवेशिक शासन के दौरान कई परिस्थितिजन्य बदलाव हुए, लेकिन अपनी मूल सांस्कृतिक सोच और परंपराओं को सुरक्षित रखना आज भी आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि जीवन में परिवर्तन स्वाभाविक है और अनुभव सबसे बड़ा शिक्षक होता है। अनुभव से मिली सीख कठिन जरूर होती है, लेकिन वह जीवनभर व्यक्ति का मार्गदर्शन करती है।मां के महत्व पर प्रकाश डालते हुए भागवत ने कहा कि मां का रिश्ता सबसे अलग और स्थायी होता है। जीवन के हर पड़ाव पर व्यक्ति को भावनात्मक सहारे की जरूरत होती है और मां ही वह स्थान होती है, जहां वह बिना किसी संकोच के अपनी भावनाएं साझा कर सकता है। उन्होंने कहा कि औपचारिक शिक्षा एक समय बाद समाप्त हो सकती है, लेकिन मां का स्नेह, मार्गदर्शन और अपनापन जीवनभर आवश्यक रहता है।
तकनीक पर अपने विचार रखते हुए भागवत ने कहा कि तेजी से बदलती तकनीक से घबराने की जरूरत नहीं है। भारत तकनीक का गुलाम नहीं, बल्कि उसका स्वामी बनेगा और मानवता के कल्याण के लिए उसका उपयोग करेगा। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपराएं केवल सिद्धांतों पर नहीं, बल्कि जीवन के व्यावहारिक अनुभवों पर आधारित हैं, इसलिए उन पर विश्वास बनाए रखना चाहिए।23 और 24 जुलाई को आयोजित इस दो दिवसीय सम्मेलन में देशभर से लगभग 280 महिला प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जबकि समापन सत्र में 900 से अधिक महिलाओं की उपस्थिति रही।





