वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच दशकों से चली आ रही दुश्मनी को अब तक दुनिया सिर्फ कच्चे तेल की राजनीति और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर कब्जे की लड़ाई के चश्मे से देखती आई है। लेकिन पर्दे के पीछे की हकीकत इससे कहीं ज्यादा चौंकाने वाली और भविष्य की तकनीक से जुड़ी है। भू-राजनीतिक विशेषज्ञों की मानें तो यह जंग सिर्फ तेल की नहीं, बल्कि भविष्य की आधुनिक तकनीक और ग्रीन एनर्जी पर राज करने की महाजंग है।
इस पूरी जंग के केंद्र में है ईरान की धरती के नीचे छिपा $27.5 ट्रिलियन (करीब 2300 लाख करोड़ रुपये) की कीमत का वो दुर्लभ खजाना, जिसके बिना दुनिया का भविष्य थम सकता है।
ईरान की धरती में छिपा है ‘फ्यूचर एनर्जी’ का चक्रव्यूह
हालिया रिपोर्ट्स और भू-वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, ईरान के पास रणनीतिक खनिजों (Strategic Minerals) का विशाल भंडार है। यह वो खनिज हैं जो आने वाले समय में दुनिया की अर्थव्यवस्था को चलाने वाले हैं:
दुनिया का सबसे बड़ा जिंक (जस्ता) भंडार: ईरान के पास वैश्विक स्तर पर जिंक का सबसे बड़ा रिजर्व है।
तांबा, लिथियम और लौह अयस्क का गढ़: इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) की बैटरियों और हाई-टेक गैजेट्स के लिए सबसे जरूरी माना जाने वाला ‘लिथियम’ और तांबा ईरान में भारी मात्रा में मौजूद है।
हाई-टेक डिफेंस की रीढ़: ये खनिज सिर्फ सोलर पैनल या गाड़ियों के लिए नहीं, बल्कि आधुनिक मिसाइल सिस्टम, फाइटर जेट्स और स्पेस टेक्नोलॉजी के लिए बेहद संवेदनशील और जरूरी हैं।
चीन के साथ ईरान की जुगलबंदी ने उड़ाई पश्चिमी देशों की नींद
अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध (Sanctions) लगा रखे हैं, जिसकी वजह से ईरान चाहकर भी वैश्विक बाजार में अपनी इस ताकत का सीधा इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। लेकिन इस पाबंदी ने एक नया समीकरण पैदा कर दिया है।
बड़ी चिंता: ईरान अब अपने इन दुर्लभ खनिजों का एक बड़ा हिस्सा चुपके से चीन को निर्यात कर रहा है। चीन पहले से ही दुनिया की सप्लाई चेन पर दबदबा बनाए हुए है, और ईरान के इस खजाने तक उसकी पहुंच ने पश्चिमी देशों (G7) के माथे पर चिंता की लकीरें खींच दी हैं।
होर्मुज से आगे की लड़ाई: कौन करेगा भविष्य पर राज?
विशेषज्ञों का कहना है कि जो भी देश इन रणनीतिक खनिजों पर नियंत्रण रखेगा, 21वीं सदी की तकनीक और ग्रीन इकॉनोमी पर उसी का सिक्का चलेगा। अमेरिका को डर है कि अगर ईरान और चीन का यह गठजोड़ मजबूत होता गया, तो भविष्य की ‘क्लीन एनर्जी’ और ‘डिफेंस टेक्नोलॉजी’ की चाबी पूरी तरह से बीजिंग और तेहरान के हाथ में चली जाएगी।
यही वजह है कि अमेरिका और ईरान का तनाव अब खाड़ी देशों के भूगोल से निकलकर एक वैश्विक टेक-वॉर (Tech-War) में बदल चुका है, जहां दांव पर सिर्फ आज का तेल नहीं, बल्कि आने वाले कल की महाशक्ति बनना है।
मुख्य स्रोत: India.Com – Hindi

