बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी न्यायिक अधिकारी के प्रति व्यक्तिगत आशंका, अदालत की कार्यवाही से असंतोष या पीठासीन अधिकारी पर लगाए गए निराधार आरोपों के आधार पर किसी आपराधिक मामले का तबादला नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने कहा कि ट्रायल ट्रांसफर के लिए ठोस और विश्वसनीय आधार होना आवश्यक है।मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा की एकलपीठ ने यह फैसला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 447 के तहत दायर एक ट्रांसफर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
क्या था मामला?
याचिकाकर्ता करुण डहरिया ने ट्रायल कोर्ट से मुकदमे को किसी अन्य न्यायालय में स्थानांतरित करने की मांग की थी। उनका आरोप था कि संबंधित न्यायिक अधिकारी के समक्ष उन्हें निष्पक्ष सुनवाई मिलने की संभावना नहीं है। उन्होंने अपने पक्ष में कुछ प्रशासनिक शिकायतों और व्यक्तिगत आशंकाओं का भी हवाला दिया।वहीं, राज्य की ओर से पैनल अधिवक्ता सौरभ साहू ने ट्रांसफर याचिका का विरोध करते हुए कहा कि याचिका तथ्यों से परे और भ्रामक है। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता निष्पक्ष सुनवाई में किसी वास्तविक बाधा को साबित करने में असफल रहे हैं।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी मुकदमे का स्थानांतरण केवल तब किया जा सकता है, जब यह स्पष्ट रूप से साबित हो कि संबंधित अदालत में निष्पक्ष सुनवाई संभव नहीं है। केवल न्यायिक अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोप, व्यक्तिगत आशंकाएं या अदालत की कार्यवाही से असंतोष ट्रांसफर का आधार नहीं बन सकते।अदालत ने यह भी कहा कि किसी न्यायिक अधिकारी के विरुद्ध प्रशासनिक जांच या शिकायत, जांच एजेंसी द्वारा कानून के तहत की जाने वाली वैधानिक जांच का विकल्प नहीं हो सकती और न ही मात्र उसके आधार पर ट्रायल स्थानांतरित किया जा सकता है।
याचिका खारिज
सभी तथ्यों और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके। इसलिए न्यायालय ने ट्रांसफर याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि न्यायपालिका में जनता का विश्वास बनाए रखने के लिए केवल ठोस और विश्वसनीय कारणों पर ही मुकदमों का स्थानांतरण किया जा सकता है।





